23 April, 2009

देखिए कैसे वरिष्ठ ब्लॉगर भी बिन पढ़े कमेंट कर रहे हैं

कभी कभी तो समय मिल पाता है भाग दौड़ वाले धंधे से मुक्ति पा कर ब्लॉग की दुनिया में विचरणे का। ब्लॉग लिखने की फुरसत मिलती ही नहीं। यह ब्लॉग तो रचना जी की एक टिप्पणी के कारण बन गया था। सो गाहे बेगाहे गलतियां दिखाने के काम आ ही जाता है। इस बार सोचा कौन सब जगह निगाह दौड़ाये चिट्ठाजगत और चिट्ठाचरचा से ही काम चला लेते हैं

मुझे हैरानी भी हुई और तरस भी आया जब मैंने आज 22 अप्रैल वाले चिट्ठाचर्चा को देखा। पाकिस्तान की एक मशहूर गजल गायीका, जिनका जनम, लालन-पालन हरियाणा के रोहतक में हुया, उनका निधन 21 अप्रैल को हो गया था। अनूप सुक्ल महाराज ने उन्हें यह कह कर श्रद्धांजलि दी कि नूरबानो का निधन हो गया। बस फिर क्या था मीनाक्षी ने गायिका नूरबानो को श्रद्धाजंलि देते हुये उनकी याद में कबाडखाने मे उन्ही की गाई हुई गज़ल सुनी, उड़न तश्तरी ने भी लिखा नूरबानो को हमारी श्रद्धांजलि, लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने नूरबानो जी का सँगीत अमर रहने की बात करते हुये लिखा -उन्हेँ श्रध्धाँजलि!

वो तो बी एस पाबला ने याद दिलाया तो अनूप सुक्ल महाराज ने टायपिंग की गलती कहते हुये सुधार कर लिया वरना पता नहीं और कितनों ने अभी उस नूरबानों को टिका दिया होता श्रद्धांजालि का कमेंट। इकबाल बानो तो रह जाती मुँह बाये।

अभी बाकी है, आगे का किस्सा।

यह पोस्ट लिखने लगा तो फिर दिमाग घूमा। डॉ। अनुराग ने तरुण जी को पोस्टो के संग्रह के जुगाड़ के लिए शुक्रिया का एक बोरा भेज दिया और जनमदिन की बधाई भी दे दी, वर्चुअल केक के साथ। अब बताईये, पोस्टो के संग्रह के जुगाड़ करने वाले थे क्न्ट्रोल पैनल वाले तरूण और जनमदिन था अल्पना वर्मा के 13 वर्षीय सुपुत्र तरुण का। अब किसको क्या गया पता नहीं।

समझ में नहीं आता, ये कथित वरिष्ठ ब्लॉगर बिना सोचे-सम्झे-पढ़े ही टिप्पणी लिख देते हैं क्या? कौन मरा किसका जनम्दिन इन्हें कोई होश नहीं?

विशवास नही होता ना? खुद ही क्यों नहीं देख लेते http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/04/blog-post_22.html

ये ऐसा क्यों करते हैं कोई बताये मुझ जैसे मूरख को, क्योंकि आप हो ज्ञानी

25 comments:

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

ये भी शुक्र है कि अनूप शुक्ला जी से सिर्फ नाम में टाईपिंग मिस्टेक हुई....अगर कहीं "श्रद्धांजली" की बजाय "शुभकामनाएं या बधाई" लिख दिए होते तो फिर क्या होता!!!!!! ये शायद पहला मौका होता जब मरने की भी बधाईंया बांटी जाती.

Udan Tashtari said...

आप किसी सार्वजनिक स्थल पर लिख दिजिये कि तीतर जी नहीं रहे.

सार्वजनिक स्थल से गुजरने वाले हर जागरुक नागरिक का कर्तव्य है कि वो रुक कर तीतर जी को श्रृद्धांजलि दे न कि डेथ सर्टिफिकेट का वेरीफिकेशन करने निकल पड़े.

जब सार्वजनिक घोषणा हुई है तो जरुर कोई विशिष्ट रहा होगा और हर किसी की तो घोषणा सार्वजनिक रुप से होती नहीं व न ही इस पर शोध की दरकार होती है कि वाकई मरा कि नहीं..

आप अति जागरुक हैं एवं साथ ही संवेदनशील भी..

एक बात और, जिस तरह से वहाँ तरुण लिखा गया है, उससे भ्रांति होना भी स्वभाविक है कि वो तरुण अन्य कोई नहीं, चिट्ठाचर्चा वाले ही तरुण ही हैं और ऐसे में डॉ साहब द्वारा बधाई भेज देने में क्या फरक पड़ जाता है..एक बार और सही.

यहीं एक ऑडीटर एवं एकाऊन्टेन्ट में अन्तर हो जाता है. एकाऊन्टेन्ट चिन्तित रहता है कि कोई एन्ट्री छूट न जाये और ऑडीटर इसलिए कि कोई गल्त एन्ट्री न आ गई हो...

चलता है भाई...काहे परेशान हो गये.इतना गहरा नहीं उतरते.. :)

ajay kumar jha said...

darasal main lagbhag beech mein hoon yani aapkee baat se bhee sehmat hoon aur sameer jee se bhee, ye blogging kee duniyaa hai dost aur varisht hon ya kanishth hain to ham aap mein se ek hee na.

मुनीश ( munish ) said...

that why this 'aap' and 'tum' culture must end here. all are too TU here.

"SHUBHDA" said...

एक नजर उन सदाबहार टिप्पणियों पर भी हो जाए, जहां शायद बिना पढ़े ही एक भाव से लिखा जाता है-- 'आपने बहुत अच्छा लिखा है, इसी प्रकार लिखते रहें, सुन्दर लेखन के लिए शुभकामनाएं, हमारे ब्लाग पर भी आएं, आदि-आदि। ऐसी लाइ्रने पहले से ही लिखी होती हैं शायद बस पेस्ट करना होता होगा...

Anonymous said...

चिट्ठाचर्चा कोई सार्वजनिक स्थल नहीं है कि कोई आये और कुछ भी लिख कर चलता बने कि यहाँ …
ये ब्लॉग परिवार की एक मिनिस्ट्री है, जहाँ यह मान कर आया जाता है कि बड़े ब>डे लोगों को ही लिखने की अनुमति िलती है जो आपनी दिनचर्या से कई घंटे निकाल कर मेहनत करके एक निचोड़ यहाँ रखते हैं, उसे विशवसनीय माना जाता है एक विशवास रहता है पाठक के मन मे

उस पर ी टिप्पी करने वाला बडे विशवास के साथ लिख्ता है कि मै जिसकि आवाज सुन आया उ्सके निधन पर अफ्सोस है तो किती ठेस लगी है ये सार्वजनिक स्थल मान कर कुछ लिखने वाला क्या जाने
नाम बदल्ने का ी ये कोइ पहला किस्सा नी है पहले भि देखा है मैनें

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

मित्र बहुत सटीक बात कह दी आपने . मै आपके विचारो से सहमत हूँ.

अनूप शुक्ल said...

लिखने में /टाइपिंग करने में गलतियां हो जाती हैं। पता लगने में सुधार किया जा सकता है। इसमें वरिष्ठ/कनिष्ठ का मामला नहीं है, मानवीय चूक का मामला है।

अनूप शुक्ल said...

अपनी पोस्ट में आप जरा टाइपिंग की /वर्तनी की कमियां देखें:

१.गाहे बेगाहे-> गाहे-बगाहे
२.चिट्ठाचरचा->चिट्ठाचर्चा
३.गायीका-> गायिका
४.सुक्ल->शुक्ल
५. कबाडखाने->कबाड़खाने
६. जनमदिन->जन्मदिन
७.सम्झे->समझे
८.जनम्दिन->जन्मदिन
९. विशवास->विश्वास
आशा है कि आप ऐसे ही हमें हमारी कमियां बताते रहेंगे और अपनी सुधारते रहेंगे।

ज्ञान said...

पाय लागूं शुक्ल महाराज
आप क्यों इतना समय बरबाद कर रहे इतनी सी बात के लिए
अब इतना तो हमें भी मालूम है कि सुक्ल नहीं शुक्ल होता है
आप अपना टाइपिंग मिस्टेक बताते हैं
जरा बताईये इकबाल (बानो) लिखने में कितनी टाइपिंग मिस्टेक होती हैं? मैं बताऊँ/
इक्बाल, इकबाला, इकबाले, इकबला, एकबाल, इकबेल, एकबाला, इकबालू, इकबालु, इकिबाल, इकीबाल, ईकबाल, इकबुल, इकबूल, इकबुलु, इक्कबाल, ईक्कबाल
और भी लिखे जा सकते हैं

लेकिन इकबाल को नूर लिख देना किस टाईपिंग गलती के दायरे में आता है, जरा समझाईयेगा!
मानवीय चूक मैं मानता हूँ।
यहाँ मुद्दा यह है कि जो दावा कर रहे हैं कि हम सुन चुके, पढ़ चुके जिसे उसके निधन पर हमें अफसोस है! क्या खा पी कर वे अपने आप सर्वज्ञानी का चोला ओढ़ झूठ बोल कर दुसरों को बेवकूफ बना रहे।
अरे इतना भी टिपियाने की क्या पड़ी है, जितना मालूम है उतना ही लिखें ना। न कि शेर आया शेर आया किसी ने कहा तो दौड़ पड़े बिना यह देखे कि कौन आया!
और आप अपने साथियों का बचाव ना ही करें महाराज। धंधे के सिलसिले में अब तीन दिन बाद ही लौट पाऊँगा फिर पांव लागूं महाराज

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यह बड़ा ब्लागर छोटा ब्लागर क्या है? ब्लागर तो ब्लागर है।

अनूप शुक्ल said...

ज्ञानजी, इकबाल को नूर टाइपिंग की गलती नहीं हमारी अपनी चूक थी।

जिन्होंने कमेंट किया वे अपने को सर्वज्ञानी नहीं कह रहे हैं। आप उनको सर्वज्ञानी बता रहे हैं इसके बाद यह कहने के लिये कि ये सर्वज्ञानी हैं लेकिन ऐसी बचकानी गलतियां करते हैं।

हमारे पांव न लगें महाराज! आप अपने काम से लगें, हम भी चलते हैं काम पर।

धंधे के लिये शुभकामनायें। जल्दी लौट के आयें!

Rachna Singh said...

http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/04/blog-post_23.html

aap ki baat is link kae kaemnt mae bhi sahii sabit hotee haen

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

बंधू यहाँ बिना पढ़े हमें अख़बार में छाँपा जा रहा है ..आप टिप्पनिओं की बात करते हैं. गलती करना बड़ी बात नही होती हाँ सुधारना बड़ी बात होती है ..और ऐसा कोई करता है तो वह बड़ा है

Anil said...

मूल पोस्ट में ही गलती हुयी है तो टिप्पणीकर्ता को दोष देना उचित नहीं।

संजय बेंगाणी said...

बड़े छोटे की बात ही बेकार है.

ज्यादा से टिप्पणी करने की इच्छा से ऐसा होता है, मानविय चुक भी जिम्मेदार है. वर्तनी दोष से कोई मुक्त नहीं.

डॉ .अनुराग said...

आदरणीय ज्ञान जी
गलती पर ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया ,वैसे अल्पना जी के बेटे को मै पूर्व में ही उनके चिट्ठे पर बधाई दे चूका था ,शायद आपने देखी हो .तरुण नाम से कन्फ्युसन हो गया ...इसलिए वर्चुअल केक भेज दिया ...चलिए अब तरुण जी असल केक भेज देते है ऐंवे ही .....उम्मीद है आपको ऐतराज नहीं होगा .

कुश said...

ब्लॉग पर उच्छल की बात पर सर्व कोतुर्य के बारे में विविश्ष्ट रूपेण प्रतिबद्धता से लेकर तत्क्षण होती सी प्रतीत करने के बाद भी उन्मुक्त वातावरण का कतिपय किन्क्यव्र्धर्मिता का पालन भी नितांत समुर्पवातीय की श्रेणी से अदोवार्ग्मुलाक्त नहीं होता है किन्तु आपने दक्शिलालोलुप्त विधि द्वारा कोशुतिकी मुद्राओ में जो लेख लिखा उसके लिए यदि गोगोस्तावस्था को छदम मानकर कोई पर्परनेनुगस्त व्यक्ति निष्णात यायावरीइय गतिविधियों का सम्प्रलेषण करने लग जाए तो कर्द्व्य्ताबधता की अवमानना की सुषुप्ता नहीं रहती..

फिर भी आपके इस कोकुलास्ताप्रण लेखन के लिए सस्तोत्तावाद..

Anonymous said...

हुंह्ह
खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे

राजकुमार ग्वालानी said...

एक-दूसरे की गलतियां और कमियां गिनाने के कुछ नहीं होता मित्रों। हमारा तो ऐसा मानना है कि वास्तव में गलती उसी से होती है जो काम करता है। जो काम ही नहीं करेगा वह गलती कैसे करेगा। यह तो अपने ब्लाग जगत की बात है। हमें याद है एक अपने देश की एक बड़ी न्यूज एजेंसी ने पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के निधन का समाचार प्रसारित कर दिया। इस खबर को कई सांध्य दैनिकों से प्रकाशित भी कर दिया, जब खबर प्रकाशित हो गई तब मालूम हुआ कि खबर ही गलत है। अब ऐसे में गलती किसी की भी रही हो पाठकों तक तो यह खबर पहुंच गई कि श्री शर्मा नहीं रहे। एक और उदाहरण कुछ समय पहले यह सामने आया था कि नई दुनिया जैसे अखबार ने अपने दिल्ली संस्करण में किसी और नाथ के स्थान पर राजनाथ की फोटो लगा दी थी। कहने का मतलब यह है कि इंसान तो होता ही गलतियों का पुतला है। कोई इंसान इस बात का दावा ही नहीं कर सकता है कि उससे गलती नहीं होती है। ऐसे में किसी को आईना दिखाने पर उसको बुरा लगना लाजिमी है। हम सब गलतियां करते हैं। गलतियों की तरफ ध्यान दिलाना है तो बड़ी शालीनता से दिलाना चाहिए, क्योंकि ब्लाग जगत में लिखने वाले सभी छोटे-बड़े एक परिवार का हिस्सा हैं और परिवार में किसी से भी गलती हो सकती है। अगर गलती को गलत अंदाज में बताया जाएगा तो सामने वाला इसका प्रतिकार करेगा और ऐसा होने पर विवाद बढ़ेगा, विवाद बढ़ा को फिर क्या होगा बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि सब समझदार हैं।

पंगेबाज said...

आपकी पोस्ट को श्रद्धा सुमन अर्पित है जी :)

Anonymous said...

@श्रीमान राजकुमार ग्वालानी जी,
मैं बड़ी शालीनता से लिख रहा हूँ कि इस प्रकरण पर सभी एक ही राग अलापे जा रहे हैं आप भी उसी कोरस में शामिल हो गये हैं। शंकरदयाल शर्मा जी से संबंधित आपकी बात सही है।
लेकिन
लेकिन
लेकिन
खबर गलत थी, नाम नहीं
यहाँ नाम ही गलत है।
नाम गलत है
नाम गलत है
नाम गलत है
माननीय ज्ञान जी का भी यही कहना है
और आदरणीया रचना जी ने भी फिर आईना दिखाया है इसी मंच पर
बात गलती करने वाले की तो है ही नहीं ज्ञान जी की पोस्ट पर
बात तो बाद में अंधानुकरण करने वालों की हुई है आदरणीय राजकुमार जी

कुश said...

बिलकुल सही कहा आपने.. एक काम करते है अनूप जी ऑर अनुराग जी को फांसी पर चढा देते है.. क्या ख्याल है ?

अविनाश वाचस्पति said...

द्विवेदी जी
ब्‍लॉगर ब्‍लॉगर छोटा बड़ा ऐसे होता है
छोटा तरबूज खरबूजा होता है
बड़ा खरबूजा तरबूज होता है
सभी छोटे बड़े ब्‍लॉगर समझे कि नाहीं
और मिसाल दें

अविनाश वाचस्पति said...

और रही बात पढ़ने की
तो हम पोस्‍ट के साथ
टिप्‍पणियां भी पढ़ जाते हैं
जरूरी हो तो पोस्‍ट पर
नहीं तो जैसे अभी
टिप्‍पणी पर प्रतिटिप्‍पणी
करी है, ऐसे कर देते हैं
पर पढ़ते अवश्‍य हैं
इसलिए छोटे ब्‍लॉगर
यानी खरबूजा हुए।