27 September, 2009

ब्लॉगवाणी करता है पक्षपात ख़ास ब्लोगरों के साथ: सबूत भी हैं

हरेक ब्लॉगर की आंखों का तारा ब्लॉगवाणी करता है पक्षपात! चौंकिए मत। ये सच है।

सबूत के तौर पर आज रात 11:12 तक ब्लॉगवाणी में इस वक्त सबसे उपर चल रहे खुशदीप सहगल के ब्लॉग पर ब्लॉगवाणी पसंद पर क्लिक कर अपनी पसंद दर्ज कराने की कोशिश कीजिए। जवाब मिलेगा कि आप अपना वोट पहले ही दर्ज करा चुके हैं!!

यहाँ सिलसिला नजर में आया था तब, जब पंगेबाज के नाम से जाने वाले ब्लॉगर को दिनेशराय द्विवेदी जी ने कथित रूप से अनुचित ईमेल भेजी थी और उसके बाद के घटनाक्रमों के कारण द्विवेदी जी के ब्लोगों पर ब्लॉगवाणी पसंद पर क्लिक किए जाने पर अंकों का बढ़ना रोका गया था। इसमें भी उनकी टापू पर आग वाली पोस्ट का खासा जिक्र हुया था। उस समय तो द्विवेदी जी ने ब्लॉगवाणी पसंद के चित्र के ऊपर ही लिख दिया था की यहाँ क्लिक करने का कष्ट ना करें, यह संख्या बढेगी नहीं!! बाद में उन्होंने उसे हटा लिया था।

यही नहीं, कुछ खासा विचारधारा की ब्लॉग पोस्टों की पसंद अप्रत्याशित रूप से बढ़ती रहती है, जबकि उसी समय पर आई अन्य पोस्टों की पसंद बढ़नी रूक जाती है। आप बारीकी से कुछ दिन इस कारनामें को देखें तो सब समझ में आ जाएगा।

इसके अलावा कुछ विशेष व्यक्तियों से जुड़े ब्लॉग पर बलोगवाणी पसंद की संख्या 6 या 9 से आगे नहीं बढ़ पाती
जब जब यह बात सामने आती है, तब तब अचानक ही रोकी हुई पसंदों का आंकडा सामान्य रूप से कार्य करने लगता है, एक दो दिन बाद पसंद बढ़नी फिर रूक जाती है। कुछ ब्लागरों द्वारा समय समय पर कई बार यह बात उठाई गई है। लेकिन यह सिलसिला जारी है।

इस पोस्ट के लिखे जाते तक खुशदीप सहगल के ब्लॉग पर ब्लॉगवाणी पसंद का आंकडा 9 पर रुका हुया है। आप कोशिश कर के देख लीजिए। कुछ ख़ास व्यक्तियों के नाम से जुड़े ब्लोगों को ध्यान से देखिये। अपना अनुभव यहाँ जरूर बताएं

91 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भाई, आप की बात सही है। ब्लागवाणी कोई सामुहिक प्रयास नहीं है अपितु एक प्राइवेट लि. कंपनी है। वह जो चाहे उसे करने का अधिकार है। किसी भी ब्लागर को उस पर कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए। ब्लागवाणी ने किसी से क्या लिया है? जो उस पर अपना हक दिखाए या उसे जनतांत्रिक तरीके से काम करने की बात कहे। यदि ब्लागवाणी पर किसी को अपना चिट्ठा दिखाना है तो उसे इन सब बातों को सहन करना चाहिए।
कल से अगर ब्लागवाणी के स्वामी उसे बंद ही कर दें तो कोई क्या कर लेगा?
हाँ, यदि किसी को या बहुत से लोगों को आपत्ति है तो अलग से टक्कर का एग्रीगेटर बना कर दिखाएँ।

कहत कबीरा...सुन भई साधो said...

आपने बिल्कुल सही कहा है. ब्लागवाणी में 'कुछ विशेष' लोगों के ही ब्लोगों पर ब्लॉगवाणी पसंद पर क्लिक किए जाने पर अंकों का बढ़ना जारी रहता है. अभी कुछ दी पहले मैं और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर "एक ब्लॉग" पर ब्लॉगवाणी पसंद पर क्लिक कर उसकी संख्या को 22 अंक तक पहुंचा दिया. ये सब क्लिक अलग-अलग जगह से किए गए थे. कुछ घंटों बाद देखने पर ब्लॉगवाणी पसंद पर शून्य नजर आया. अगर यही सब करना है तो फिर "ब्लॉगवाणी पसंद" का नाटक ही क्यों रचा गया है? क्या कुछ "विशेष" लोगों को खुश करने के लिए.

दिनेश जी ने सही कहा है---------- "ब्लागवाणी कोई सामुहिक प्रयास नहीं है अपितु एक प्राइवेट लि. कंपनी है। वह जो चाहे उसे करने का अधिकार है। किसी भी ब्लागर को उस पर कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए। ब्लागवाणी ने किसी से क्या लिया है? जो उस पर अपना हक दिखाए या उसे जनतांत्रिक तरीके से काम करने की बात कहे। यदि ब्लागवाणी पर किसी को अपना चिट्ठा दिखाना है तो उसे इन सब बातों को सहन करना चाहिए।
कल से अगर ब्लागवाणी के स्वामी उसे बंद ही कर दें तो कोई क्या कर लेगा?
हाँ, यदि किसी को या बहुत से लोगों को आपत्ति है तो अलग से टक्कर का एग्रीगेटर बना कर दिखाएँ।"

लेकिन सवाल यह है कि जब कुछ "विशेष" लोगों को ही खुश करना है तो फिर ब्लॉग जोड़ने का ड्रामा ही क्यों किया जा रहा है. विशेष अधिकार प्राप्त लोगों को छोड़कर सभी के ब्लॉग इस एग्रीगेटर हटाकर यह किस्सा हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए--------क्या विचार है???????????????????????

pankaj vyas said...

aab se gour karenge...

Arvind Mishra said...

मुझे तो यह जानकर आश्चर्य होता है की लोग ब्लॉग लेखन से इतर भी कई कारनामों में लगे रहते हैं ! यह इन्वेसटीगेटिव ब्लागिंग तो नही है हा हा !

ali said...

मेरे मित्र भी ऐसा ही कहते हैं !
बहुत दिनों से सोच में था द्विवेदी जी की टिप्पणी से निर्णय लेने की प्रेरणा मिली है !

ज्ञान said...

अब आप लोग खुद ही देख लें.
मेरे ब्लॉग पर ब्लॉगवाणी पसंद का विजेट नहीं है लेकिन पसंद का अंक ९ पर जा पहुंचा है. जबकि खुशदीप जी के ब्लॉग पर विजेट होने के बावजूद ९ से आगे ही नहीं जा रही पसंद.

अपनी खाल बचाने के लिए यह भी एक तरीका है कि कोई उंगली उठाये तो भ्रम में डाल दिया जाए कि इनकी पसन्द तो बढ़ रही है ना हम गलत थोड़े ही हैं

ज्ञान said...

@ अरविंद जी
जब पीत ब्लोग्गिंग हो सकती है तो इन्वेसटीगेटिव ब्लागिंग क्यों नहीं

मुनीश ( munish ) said...

IF this is true then itz really disgusting ! I think Blogvani should openly declare its censorship rights. It has every right to do so.

Ratan Singh Shekhawat said...

दिनेश जी की बातो से सहमत

अजय कुमार झा said...

इस बात का पता मुझे भी काफ़ी पहले पता चला था...और तब से कई बार ये बात बार बार हुई है...मैं इन कारणों से न भी तो भी...अन्य विकल्पों के रूप में और ऐग्रीगेटर्स लाये जाने के पक्ष में रहा हूं...इससे न सिर्फ़ ब्लोग्गिंग को विस्तार मिलेगा..बल्कि यकीनन लोगों को और भी पढने और जानने को भी मिलेगा...सिमितता थोडे दिनों बाद एक बंधन सी लगने लगती है..इसलिये जानकार लोगों को यकीनी तौर पर इस बारे में सोचना चाहिये...जहां तक इस मुद्दे की बात है तो ...मुझे लगता है कि ब्लोगवाणी को भी अपनी बात रख कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये....

Anil Pusadkar said...

ab to aap gyani sabit ho gaye

avinash said...

आपलोग बेवजह हल्‍ला मचा रहे हैं। मैंने अभी इसकी पसंद पर क्लिक किया और 12 से 13 नंबर हो गया। दरअसल एक बार में एक क्लिक लेता है ब्‍लॉगवाणी। आप चाहेंगे कि पचास बार आप ही अपनी पोस्‍ट पसंद कर लें, ऐसा नहीं होगा। पचास अलग-अलग आईपी एड्रेस से अलबत्‍ता जरूर ये क्लिक नंबर बढ़ाता रहेगा। फालतू की बहस है ये।

डा. अमर कुमार said...


आरोप तो जोरदार हैं, पर..
सबूत क्या हैं ? आपने शीर्षक में सबूत होने का दावा किया था !
आरो तथ्यहीन न हो, पर वह सँदेह का लाभ लेने के हक़दार तो हैं ही ।
वईसे स्वाँतः सुखाय लिखने वालों को पसँद की चिन्ता ही क्यों करनी चाहिये ?

ज्ञान said...

@ अविनाश
आपका कोई परिचित ब्लॉगर तो होगा दुनिया के किसी दुसरे कोने में? उसे कहिये वह क्लिक कर देखे आज के दिन को छोड़ कर.
क्योंकि अब तो ब्लॉगवाणी वाले सतर्क हो गए है.
कौन बकवास कर रहा समझ में आ जाएगा
पोस्ट को फिर से पढिये, समझ न आये तो चुप रहिये
जो अपना परिचय नहीं दे पा रहा उसे बकवास करने का भी कोई हक नहीं

@ डॉ अमर कुमार जी
द्विवेदी जी जैसों की स्वीकृति सबूत नहीं तो और क्या है? उनसे बात करेंगे तो कई विस्फोटक जानकारियां मिल जाएंगी आपको

Suresh Chiplunkar said...

जहाँ तक मेरी तकनीकी जानकारी है (यानी कि बहुत ही कम), उसके अनुसार एक कम्प्यूटर से सिर्फ़ एक बार ही पसन्द का चटका लगाया जा सकता है, उसके बाद वह उसे स्वीकार नहीं करता (शायद)… अब यह बात तो सार्वजनिक है कि हर व्यक्ति अपनी पोस्ट पर अपने मित्रों से कहकर चटके लगवाता है। अधिक विवादास्पद पोस्टों अथवा अधिक टिप्पणी प्राप्त पोस्ट पर स्वाभाविकतः अधिक चटके लग जाते हैं, ऐसे में किसी पक्षपात की सम्भावना लगती तो नहीं, यदि किसी खास विचारधारा के प्रति झुकाव वाली बात होती तो सलीम, कैरानवी, फ़िरदौस आदि के ब्लॉग इतने लोकप्रिय(?) न होते…। भले ही आपकी पोस्ट पर पसन्द का विजेट नहीं है, लेकिन सीधे ब्लागवाणी के साइड बार से ही आपकी पोस्ट पर चटका लगाया जा सकता है। पहले भी ब्लागवाणी पर इस प्रकार के आरोप लगे हैं और शायद "भड़ास" को छोड़कर उन्होंने अभी तक किसी ब्लाग को प्रतिबंधित नहीं किया है…। और जैसा कि द्विवेदी जी ने कहा है, यह एक प्राइवेट कम्पनी है, जिसे आपत्ति हो वह अपना ब्लाग हटा सकता है या नया एग्रीगेटर बना सकता है। इसलिये अधिक विवादास्पद पोस्ट = अधिक चटके या अधिक मित्र = अधिक पाठक = अधिक टिप्पणियाँ = पसन्द के अधिक चटके। मेरा तो यही विचार है, देखते हैं ब्लाग जगत के नवीनतम (और महानतम) अवतार सलीम और कैरानवी इस बारे में क्या कहते हैं… :)

ज्ञान said...

@ अविनाश
@ चिपलूनकर जी
वैसे आप अभी के अभी खुशदीप सहगल की उस पोस्ट पर सैकडो हजारों किलोमीटर दूर से क्लिक करवा कर नतीजा देख लो या खुद ही किसी दूसरे IP से क्लिक कर देख लीजिये

महफूज़ अली said...

mere saath bhi aisa ho chuka hai...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आपकी बात सही है....इसका तो हमने भी अनुभव किया है बल्कि कईं बार तो ऎसा भी देखा है कि किसी व्यक्ति विशेष की पोस्ट 24 घंटे की समयावधि व्यतीत होने के पश्चात भी दिखाई देती रहती है।।

दर्पण साह "दर्शन" said...

aaj adhik pasand prapt:
1st rank aapki hi hai (15)

:)

may be ab hosh main aa gaye hon....

ज्ञान said...

पोस्ट लिखे जाने के 6 घंटो बाद जाकर खुशदीप जी के ब्लॉग पर पसंद 9 से बढ़कर 10 हुयी है लेकिन अटक भी गई है फिर से 10 पर! दुनिया के किसी भी कोने से क्लिक किये जाने पर बढ़ोत्तरी नहीं हो रही।

Suresh Chiplunkar said...

खुशदीप वाले में कोई तकनीकी समस्या होगी शायद, मैंने तो आपकी पोस्ट पर चटका लगाया तो 14 और 15 हो गई…??

राजीव तनेजा said...

अपुन को तो कोई पसन्द करता ही नहीं है

:-(

ज्ञान said...

@ चिपलूनकर जी
खुशदीप जी के ब्लॉग पर 9, 10 तक कोई समस्या नहीं और बाद में हो गयी?
इसका मतलब आपभी मान रहे हैं कि गड़बड़ हो रही!

ज्ञान said...

दिनेशराय द्विवेदी जी की इस पोस्ट पर कोई भी ब्लॉगवाणी पसंद पर क्लिक कर देख ले। संख्या 9 से आगे तब नहीं बढ़ेगी जब तक ब्लॉगवाणी में हलचल नहीं होगी
पोस्ट है
http://anvarat.blogspot.com/2009/06/blog-post_21.html
यह पोस्ट किसी खास समूह की ओर इशारा कर के लिखी गयी लगती है। टिप्पणियां भी इस बात का समर्थन करती हैं

बी एस पाबला said...

बात तो बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप। मैं भी भुक्तभोगी हूँ इसका।

मुझे याद है द्विवेदी जी उस टापू वाली पोस्ट के बाद ब्लॉगवाणी के इस बर्ताव से काफी क्षुब्ध थे।

इसके बाद भी ब्लॉगवाणी की टीम ने कभी स्वीकार नहीं किया कि यह कोई तकनीकी खामी है। अरे जब दिग्गज गूगल अपनी तकनीकी खामियाँ स्वीकार कर सकता है तो ब्लॉगवाणी क्यों नहीं। शायद इसलिए कि आरोप सही हैं या शायद इसलिए कि किसी तरह की जिम्मेदारी की भावना, ब्लॉगरों के प्रति, है ही नहीं इनमें।

हिंदी की सेवा अलग बात है, वैचारिक मंतव्य अलग बात है।

वैसे अमर कुमार जी का कहना भी ठीक है कि पसंद की चिंता ही क्यों करनी :-)

ब्लागबाणी said...
This comment has been removed by the author.
ब्लागबाणी said...

ज्ञान जी, बधाई! ब्लागवाणी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली।
खुद ही विदा हो ली।
लेकिन ब्लागबाणी है न!

ज्ञान said...

ब्लॉगवाणी गायब? सच में?
यहाँ देखें

निशांत said...

ज्ञान, आपके लिंक में दी गई चीज़ हिंदी blogvani नहीं बल्कि मराठी blobwani है!

ज्ञान said...

बंधु निशांत
यह w भी v जैसा ही घर की खेती है
वैसे इन लिंक्स को कोई भी देख सकता है

http://ramyantar.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html

http://akshatvichaar.blogspot.com/2009/05/blog-post_09.html

http://prashant7aug.blogspot.com/2008/08/blog-post_5174.html

डा. अमर कुमार said...


ब्लागवाणी टीम के लिये यह होम करते हाथ जलने वाली बात है ।
इस टीम की यह घोषणा एक असहाय स्थिति की कथा कह रही है ।
मैं पहले यहीं लिख चुका हूँ कि, स्वाँतः सुखाय लिखने का दम भरने वाले पसँद की परवाह ही क्यों करें ?
पसँद पर चटका लगवाने में ब्लागवाणी स्वयँ ही चटक गया, हम इतने उदार नहीं हो पाये हैं कि, किसी अन्य के लोकप्रियता ( ? ) बढ़ने पर हर्षित हों ।
यह सारा टँटा दुःखद है, और एक अशुभ सँकेत दे रहा है, चिट्ठा चच्चा तो पहले ही चटक कर चुप मारे हुये हैं ।
लगता है कि, हम सब समय से पहले ही शहर की ओर भागने लग पड़े थे... दूसरे की देखादेखी एक आत्मघाती दौड़ में !!

रवीन्द्र रंजन said...

मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि तकनीकी रूप से कमजोर कुछ लोगों ने अनाप-शनाप आरोप लगाकर ब्लॉगवाणी की बलि ले ली। अगर आप लोग सच्चे रचनाकार हैं तो पसंद नापसंद के आंकड़ों के चक्कर में क्यों पड़ते हैं। चुपचाप अपना लेखन कर्म कीजिए। अच्छा लिखेंगे तो जरूर पढ़े जाएंगे। सराहे भी जाएंगे। अब भी समय है। हिंदी ब्लागरों बड़े जाओ। बच्चों जैसी हरकतें छोड़ दो।

हिमांशु । Himanshu said...

इस प्रविष्टि के नाते ब्लॉगवाणी विदा हो ली ? आश्चर्यजनक है । बात जो भी हो, पर ब्लॉगवाणी की विदाई खलेगी हमें ।

Ratan Singh Shekhawat said...

आखिर इस तरह की टांग खिंचाई ने ब्लॉग वाणी को विदा कर दिया है | अब खुश रहिए और चिट्ठाजगत के सिस्टम में खामियां निकलकर उजागर कीजिए ताकि एक दिन उसे भी बंद कर दिया जाए |

अपने ही टांगो पर कुल्हाडी मारने पर हिंदी ब्लॉग जगत को बहुत बधाई |

ज्ञान said...

एक हताश,लज्जित,असहाय,जवाबदेही से बचने वाले ने ग्लानिवश आत्महत्या कर ली और अब इसे शहादत का रंग दिया जा रहा। आज कहा जा रहा कि यह पोस्ट लिख कुल्हाड़ी मार ली गयी है। जबकि ब्लॉगवाणी ने तो किनारे में रखी कुल्हाड़ी पर खुद पैर जा मारे हैं।
जैसे कि अमर कुमार जी ने लिखा कि ब्लागवाणी टीम के लिये यह होम करते हाथ जलने वाली बात है ।

@ रवींद्र रंजन जी
अनाप-शनाप आरोप नहीं ये अकाट्य आरोप हैं। ए टिप ऑफ आइसबर्ग। … घड़ा भरते देख अपनी बलि खुद ही लेना क्या दर्शाता है।?
अगर आप सच्चे रचनाकार हैं तो चुपचाप अपना लेखन कर्म कीजिए। कौन तकनीकी रूप से कमजोर है सभी देख रहे हैं। जो अपने आप को दुरूस्त करने के बदले खुद ही विदा हो जाये उसे कायर या अक्षम ही कहा जाता है।
अनाप शनाप लिखकर बच्चों जैसी हरकतें छोड़ दीजिये

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

तो ये बात है
ज्ञान जी ऐसे दशहरा मनवाया
चलो जो जिसे जैसा चाहे करे कराए
हम तो विजयादशमी की मनाएं

Vivek Rastogi said...

चलो बधाई हो आपको सबके पैर पर अकेले आपने कुल्हाड़ी मारी है, अकेले आपने नहीं और भी बहुत से लोग हैं पर हाँ शायद आखिरी वार आपका ही था।

आपको बधाई आपने अपने बुराई रुपी रावण को मार डाला इस दशहरे पर, पर आपका रावण हमारा हिन्दी ब्लॉग समाज था।

ज्ञान जी मेरी बात का कृप्या बुरा न मानियेगा मैं तो एक अदना सा ब्लॉगर हूँ और मेरी नजर में हिन्दी एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी का क्या महत्व है आप मेरे चिट्ठे पर देख सकते हैं।
http://kalptaru.blogspot.com/2009/09/blog-post_8783.html

mahashakti said...

जो हुआ अच्‍छा नही हुआ, ब्‍लागवाणी बंद क्‍या हुआ सबके मुँह की बोलती खुल गयी, सही कहा है भगवान ने मुँह दिया है ढ़क्‍कन नही, बोलो जोर जोर से बोलो, दिक्‍कत तो रेग्‍युलर ब्‍लागरो की होगी, हम तो कभी कभार वाले है, पढ़े जायेगे नही पढ़े जायेगे कोई फर्क नही पड़ता।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

गौंटिया ग्रॉड ढिल्‍लन म बईठ के ये बारे म बिचार कर लेबोन, कब आना हे बताहू.

आपको विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांए.

बवाल said...

ये तो होना ही था.........

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

तुम मुरख मैं ज्ञानी...

चिट्ठा जगत की जय हो...एक एग्रीगेटर की ज़रुरत है.

Suresh Chiplunkar said...

चलिये आप को बधाई हो, आप की वजह से हिन्दी एक मुख्य वेबसाईट बन्द हो गई। लोग खुद ब्लाग बन्द करते हैं, जबकि ब्लागजगत में आपने यह हादसा करवा दिया। अब इसके पीछे क्या कारण है, यह तो वक्त आने पर पता चल ही जायेगा, चटके न लगने से किसके पेट में दर्द हो रहा था, किस "खास विचारधारा" को लक्ष्य बनाकर किस दूसरी "खास विचारधारा" ने पीठ में छुरा घोंपा है, सब पता चलेगा…। फ़िलहाल तो किसी पोस्ट को पढ़ने का मन नहीं हो रहा… किसी दूसरी पोस्ट पर काम करते-करते यह खबर मिली की ब्लागवाणी बन्द हो गई, निश्चित रूप से यह एक बड़ा षडयन्त्र है… जिसकी सच्चाई जल्द ही सामने होगी… तब तक मुस्कराते रहिए…।
(यह टिप्पणी हटाइयेगा नहीं… मैने इसका स्नैपशॉट ले रखा है… :)

महेन्द्र मिश्र said...

डाक्टर अमर कुमार जी काफी हद तक सही कह रहे है हवन कर हाथ जलने वाली बात ही लग रही है .....

Suresh Chiplunkar said...

अब जबकि ब्लागवाणी बन्द हो गई है, तब जिस प्रकार आपको ब्लागवाणी पर शक करने का आधार था, उसी प्रकार अब कई लोगों को आप पर शक हो रहा है कि -
1) क्या आपकी यह पोस्ट किसी खास समूह द्वारा लिखवाई गई है?
2) क्या आपको किसी अन्य एग्रीगेटर से ऐसा लिखने के लिये पैसा मिला है?
3) आपकी पसन्द नहीं बढ़ने से आप दुखी थे, क्योंकि इतना बुरा लिखते थे कि आपको पसन्द की फ़िक्र थी?
4) कोई नया एग्रीगेटर आने वाला है, जिसमें आपकी भागीदारी है?
5) किसी "खास विचारधारा" से प्रभावित होकर, या किसी खास विचारधारा को दबाने के लिये आपने ब्लागवाणी पर यह आरोप लगाये?

अब भईया शक तो बहुतेरे हैं, क्योंकि जब आपने दूसरों पर शक किया है तो आप पर भी खुद-ब-खुद बाकी चार उंगलियाँ उठ जाती हैं। हम तो ठहरे गैर-तकनीकी व्यक्ति, उज्जैन जैसे गाँवड़े में रहने वाले, बड़े-बड़े शहरों में क्या षडयंत्र चलते हैं हमें क्या पता? शक के बादल घुमड़ रहे हैं इसलिये आप से पूछ लिया… अब जैसा स्पष्टीकरण ब्लागवाणी ने दे दिया है, वैसा ही आप भी दीजिये… :)
नोट- उपरोक्त सभी प्रश्न आज टेलीफ़ोन पर हुई चर्चाओं के आधार पर हैं, कई लोग लिखना चाहते थे, लेकिन बुराई का ठीकरा मेरे ही सर फ़ूटे इसलिये यह गुस्ताखी मैंने ही कर दी…

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ चिपलूकर जी - होसकता हे यह उस डब्‍बे वाली कम्‍पनी ने बंद करवाया हो, आपको ऐसी पोस्ट लिखनी नहीं थी, लिखी तो कैरानवी का समर्थन नहीं लेना था, वेसे आप ना लेते तब भी जनहित, देशहित में मेरा समर्थन आपको झेलना पडता,

बलागवाणी के बंद होने के दिन एक और उमर ब्लाग जगत में आया है उसका स्‍वागत करने पहुंचिये, आज चटका लगाने की भी जरूरत नहीं, आपतो पहुंचोगे ही इधर के पाठकों को उधर कमेंटस का कुछ भाग,

लेख''उलमाओं का फतवा चाँद तारा मुसलमानों का निशान नहीं है'' : उमर सेफ
''ब्लावाणी बंद नहीं हो गया मुझे लगता है वह हमारीवाणी नाम से फिर शुरू होगा,अगर दूसरे उमर की एंट्री के दिन बंद होगया है तो मुझे भी अफसोस है एक दो महीने और चल जाता तब तक मेरा काम होजाता फिर मुझे पर्सियन ब्लागिंग में चले जाना था, उसके चले जाने से मुझे और अधिक समय तक इधर ही रूकना पडेगा,
Monday, September 28, 2009
http://hamarianjuman.blogspot.com

विशेष सूचनाः आज ब्लागवाणी बंद होने के गम में आज प्रचार लिंक नहीं दूंगा,

Mohammed Umar Kairanvi said...

मुझे इस ब्लाग पर आकर और यह देख कर मैं मूर्ख तू ज्ञानी बहुत खुशी हुई, ऐसे जुमलों मुझे बहुत खुश कर देते हैं, रही बात पोस्‍ट की तो भैया हम तो कुछ कह नहीं सकते क्‍यूंकि ब्लागवाणी ने हमें अपना समझता तो हम उसके बंद होने के गम में दिल से (जैसे चिपलूनकर साहब के साथ है हृदय से) आज गम मना रहे होते,अब तो उसका कहना आगे की सोचना है, सोचना भी किया है चिटठाजगत की तरफ तो सब नार्मल है एक दो बार उंगली उठाई तो एक जैन साहब ने ठंडा कर दिया था,

भारतीय उर्दू भाषा(शंका हो तो जेब से नोट निकालो उसपर 15 भारतीय भाषाओं में कितने का नोट है लिख होता है) वाले इस तरह के सब कामों से फारगि हैं, क्‍यूं ना उनसे कहा जाये कि वह हिन्‍दी का हमसब की वाणी बनायें (हम अर्थात कैरानवी), कोई कहे तो में पटना के काशिफ साहब से जो उर्दुस्‍तान डाट Rank-5 चलाते हैं कहूं, उनके साथ अपना पुराना साथ है, आप लोग ना भी कहो hamarianjuman.blogspot.com इस पर विचार कर रही है,

PD said...

भाई साहब, मेरे द्वारा किये हुये पोस्ट का उदाहरण दे कर मुझे लपेटे मे मत लें.. मैंने उसकी तकनिकी खराबी पर प्रश्न उठाया था, ना कि उनके भावना पर.. तकनिकी खराबी कहीं भी हो सकती है.. कोई भी साफ्टवेयर 100% एरर फ्री नहीं हो सकता है, यह आप किसी भी साफ्टवेयर प्रोफेशनल से पूछ लें.. या फिर मेरा यह पोस्ट पढ़ लें..

वैसे अब तो आप बहुत खुश होंगे.. है ना?

ज्ञान said...

@ विवेक रस्तोगी
जब आप कहते हैं कि और भी बहुत से लोग हैं
तो इसका मतलब आप भी बहुत कुछ जानते हैं

@ चिपलूनकर जी
जब आप कहते हैं कि मेरी वजह से हिन्दी की एक मुख्य वेबसाईट बन्द हो गई मैंने यह हादसा करवा दिया तो इसका मतलब यह निकलता है कि केवल मैं ही मूरख नहीं।
मैंने आज तक कोई टिपाणी नहीं हटायी अब क्या हटाऊनगा

मैंने कोई शक जाहिर नहीं किया था वास्तविकता बताई थी जिसके समर्थन में अनेकों लोग अपनी बातें कह चुके हैं
अब रही बात आपके सवालों के जवाब की
1)यह पोस्ट किसी खास समूह द्वारा नहीं लिखवाई गई है(मैं किसी समूह में नहीं हूँ, ना ही किसी के सम्पर्क में)
2) किसी अन्य एग्रीगेटर से ऐसा लिखने के लिये पैसा नहीं मिला है(आज तक मैंने जो कुछ लिखा है अपनी मर्जी से लिखा है।मैं कोई बच्चा नहीं जो किसी के कहने से अपना होमवर्क करे। हर काम पैसे के लिये नहीं किया जाता। अपको मिलता होगा तो कह नहीं सकता)
3)पसन्द बढ़ने न बढ़ने से दुखी होने या फिक्र होने का तो कोई तुक ही नहीं क्योंकि मेरे ब्लॉग पर तो पसंद का विजेट ही नहीं है यह बात लिख भी चुका हूं(मै लगातर लिखता भी नही हू पापुलर भी नहीं हू। ब्लॉगवाणी पर कोई कर दे क्लिक तो मैं क्या करूं वैसे भी मुझे प्सन्द की चिंता नहीं)
4)किसी नये एग्रीगेटर के आने की मुझे कोई जानकारी नहीं है भागीदारी का कोई सवाल ही नहीं
5)मैंने किसी भावना विचारधारा के अधीन नहीं लिखा न ही किसी के विरोध में(किसी की निय्यत में खोट हो तो मैं क्या करू)
ब्लॉगवाणी ने मूल मुद्दे पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि घंटों हफ्तों महीनों के बाद भी किसी पोस्ट में पसंद का आंकडा क्यों नहीं बढ़ता
न तो आपने कोई बुराई की है न ही आपने कोई गुस्ताखी। आप एक सममाननीय स्थान रखते हैं इसलिये आपको उत्तर दिया।बेनामियों की मुझे परवाह नहीं।

ज्ञान said...

@ PD
मैंने किसी को लपेटे मे नहीं लिया है। मैंने भी तकनिकी खराबी पर प्रश्न उठाया था ध्यान दिलाया था और मैं अकेला ही नहीं आप देख चुके हैं

निशाचर said...

दान की बछिया के दांत गिनने के चक्कर में ज्ञानी जी ने विप्रजनों के बौद्धिक पेट पर ही लात मार दी. अब कुछ लोगों की छपास मिट नहीं रही थी और उस पर भी चटके का तड़का चाहिए था तो भैया इसमें अधिकांश स्वान्तः सुखाय रचनाकर्म में लीन लोगों का क्या कसूर था ?

आशा है ब्लागवाणी संचालकगण अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगे.

डॉ .अनुराग said...

कमाल है तो लोग पसंद के लिए ब्लोगिंग करते है ....ओर टिप्पणियों के लिए...एक बात बताये लोगो का व्योवाहार उन अनुचित बातो के लिए क्यों बदलता है जो उनके साथ हुई हो.....तब क्यों नहीं जब किसी दूसरे के साथ .माफ़ कीजिये ज्ञान जी मैंने यहां बड़े बड़े धुरंधरो को चुप्पी डाले देखा है या अजीब से तर्क ...विवाद से कन्नी काटने से बचने के लिए ...तब क्या किसी ने उनके ब्लॉग बंद करने की बात की है ?

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

ब्लोग्वानी का बंद होना जल्द बाजी में लिया गया फैसला है. आशा है ब्लोग्वानी दुबारा जीवित होगी. सबको अपनी बात कहने का हक़ है इसे ब्लोग्वानी के ब्लॉग में लिखा जा सकता था ज्ञान जी के तर्कों का खंडन/स्पस्टीकरण दिया जा सकता था .. खैर यह सब दुखद है ..मेरे सामने यह दूसरा ब्लॉग संकलक विदा ले रहा है ..यह हिंदी ब्लॉग जगत के लिए अपूरणीय क्षति है

जी.के. अवधिया said...

बात चाहे जो भी हो, हमारे लिए तो ब्लॉवाणी एक लत बन गई हैः

सुबह चाय पीते समय अखबार की आदत जैसे ही कम्प्यूटर खोलते ही ब्लॉगवाणी ओपन करने की आदत सी हो गई है। अब क्या करें?

कुश said...

सभी जगत ये पूछे था, जब इतना सब कुछ हो रियो तो
तो शहर हमारा काहे भाईसाब आँख मूंद के सो रियो थो
तो शहर ये बोलियो नींद गजब की ऐसी आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे

संजय बेंगाणी said...

कभी नारद पर बुद्धिजीवि कहलावे वाले लोगो ने हमला किया था, मगर व अविचलित रहा. आज नारद कहीं खो गया है तो उसके अन्य कारण है. ब्लॉगवाणी को पलायन नहीं करना चाहिए था. विरोधियों से समर्थकों की संख्या कहीं अधिक थी.

ज्ञान said...

@ अवधिया जी
लत बहुत बुरी चीज होती है।काम का आदमी भी बेकार हो जाता है।

Udan Tashtari said...

ब्लॉगवाणी का जाना बेहद दुखद, निराशाजनक फैसला है.

ज्ञान said...

@ चिपलूनकर जी
आपके एक सवाल पर मैं भी सवाल करता हूं
आपनए लिखा है कि क्या आपकी यह पोस्ट किसी खास समूह द्वारा लिखवाई गई है?
तो मेरे सवाल यह है कि
1)वह कौन कौन से खास समूह हैं?
2)इन खास समूहों के सद्स्यों की कुल संख्या कितनी है?
3)आप किस खास समूह में हैं,नहीं है?
4)इन खास समूहों की विचारधारा क्या है?
5)इन खास समूहों की पिछली दो-दो उपलब्धियां कौन सी हैं?
6)क्या ब्लॉगवाणी से कोई खास समूह जुड़ा है?
7)इन खास समूहों से जुड़ने के लिये क्या करना पड़ेगा?
ये सवाल तभी उपजे हैं जब आपने खास समूह होने का जिक्र किया है।
आशा है इन सवालों में कोई बुराई नहीं मानी जायेगी और ना ही किसी की शान में कोई गुस्ताखी होगी

जी.के. अवधिया said...

@ ज्ञान

माना कि धूम्रपान करने जैसी लत बुरी चीज है किन्तु चाय पीने को बुरा नहीं माना जाता जबकि यह भी एक लत होती है। आप समझ ही गए होंगे कि सभी लत बुरी नहीं होती।

खैर अब तो जो हो गया सो हो गया और अधिक बहस करने से क्या फायदा?

Suresh Chiplunkar said...

@ ज्ञान जी,
समूह तो दो ही हैं, राष्ट्रवादी और सेकुलर… हम किस समूह में हैं सभी जानते हैं…। सारा विवाद पसन्द की संख्या की वजह से शुरु हुआ है। पिछले कुछ समय से पसन्द की संख्या में "राष्ट्रवादी ब्लॉग्स" की संख्या बहुत बढ़ गई थी, इसलिये हो सकता है कि इस "खास विचारधारा" पर हमला बोलने के लिये दूसरी खास विचारधारा वालों ने ब्लागवाणी की आलोचना को सहारा बनाया गया हो… आपकी तरह ही मैंने भी तो सम्भावनाएं व्यक्त की थीं। आप इसे व्यक्तिगत न लें…। लेकिन इन दो समूहों के झगड़े में तीसरे "तटस्थ समूह" का सबसे अधिक नुकसान हुआ है…। भई, सम्भावनाएं व्यक्त करने में क्या हर्ज है, शुरुआत आपने की ब्लागवाणी के पक्षपात की सम्भावनाओं की, तो लगे हाथों मैंने भी कर दीं, अब आपने फ़िर से नई प्रश्नावली तैयार कर दी है तो मैंने भी अपनी सम्भावना बता दी… आप सहमत हों या न हों… लड़ाई तो विचारधारा की ही है, और ध्यान रहे "खास विचारधारा" का शब्द भी आपने ही पहले उछाला है।

मीनू खरे said...

बाप रे बाप ! ब्लॉगिंग के पीछे की दुनिया में इतने रंग मिलते हैं!!!! आश्चर्यचकित हूँ ..!!! यह सब किन लोगों के कारण हुआ नही मालूम पर यह सच है कि इस लड़ाई में "तटस्थ समूह" का सबसे अधिक नुकसान हुआ है…।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

यह सभ्य-संस्कृति की कोई सही मिसाल नहीं है "कोई" भी किसी के अवदान का इतना अपमान करने का अधिकारी नहीं हो सकता जिनने ऐसा किया है कि ब्लागवाणी-टीम हताश हुई दु:खद

राहुल प्रताप सिंह राठौड़ said...

ब्लोगवाणी जो काम कर रही थी, वो बढ़िया था | नए ब्लोगरों को चिट्ठाजगत, नारद के बारे में ज्यादा पता नहीं होता है | ब्लोगवाणी काफी पोपुलर हो गया था | अब नए ब्लोगरों तथा पाठकों को चिट्ठाजगत, नारद को बताना पड़ेगा |बहुत गलत हुआ |

सतीश पंचम said...

ब्लॉगवाणी का बंद होना दुखद प्रकरण है। मैं आपकी इस पोस्ट से सहमत नहीं हूँ। तकनीकी खामियों से मुक्त सॉफ्टवेअर बहुत कम होते हैं और आपने शायद उसे ब्लॉगवाणी की ओर से की गई शरारत मान लिया है। वैसे मुझे ब्लॉगवाणी के इस पसंद वाले चटके वगैरह में खामी नहीं दिखी ब्लकि एक तरह से ब्लॉगवाणी ने उसे हर IP से सिर्फ एक बार Accept करने का Option रखा। लेकिन जब कुछ ब्लॉगरों की नीयत ही खोटी हो तो क्या किया जाय।

कहावत है कि अधजल गगरी छलकत जाय....वही आपके इस पोस्ट का भी हाल है। आधे अधूरे ज्ञान के बल इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिये।

यदि सॉफ्टवेअर क्षेत्र से आप जुडें होते तो ऐसी बातें न करते।

मैं आपकी इस पोस्ट पर अपना विरोध दर्ज करता हूँ।

रंजन said...

"जो हम आपस में न झगड़ते, बने हुऐ क्युं खेल बिगड़ते...."

ज्ञान said...

@ सतीश पंचम जी
जब ब्लॉगवाणी का गुडबाय मैसेज कहता है कि
>>ब्लागवाणी की पसंद का दुरुपयोग साधारण प्रयोक्ता के लिये आसान नहीं था (विसेश प्रयोक्ता के लिये आसान था?)
>>कुछ समय में ऐसी ब्लाग पोस्ट आयीं जिनमें ब्लागवाणी की पसंद का दुरुपयोग करके बेबात बढती पसंद पर चिंता जताई गई थी।(दूसरे ब्लॉगरों की पुरानी पोस्टें देखिये)
>>अपने इन्टरनेट कनेक्शन को बार-बार डिसकनेक्ट करके फिर से कनेक्ट कर IP बदल कर और ब्राउज़र में कैश मिटाकर या IP बदलने वाले औजरों का प्रयोग करके पसंद बढाने के बारे में बताया गया था।(आप दूसरे ब्लॉगरों की ऐसी पुरानी पोस्टें देख सकते हैं)
>>नकली पसंदो का अध्ययन किया गया था(नतीजे में ब्लॉगवाणी ही बंद कर दी)

और आप कहते हैं कि
>> कुछ ब्लॉगरों की नीयत ही खोटी थी।(क्या आप बता सकते हैं कि वे कौन कौन थे?)
तो मेरी बातों से असहमति और विरोध क्यों? क्योंकि मैंने यह बात जाहिर की इसलिए?
जैसा कि पहले भी कहा गया है कि ब्लॉगवाणी का मूल मुद्दे पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि जब उनका प्रोग्राम किसी ब्लाग पर आने वाली पसंदे कुछ समय के लिये रोक देता है तो घंटों हफ्तों महीनों के बाद भी किसी पोस्ट में पसंद का आंकडा क्यों नहीं बढ़ता?
जनाब ब्लॉगवाणी मामला उतना मासूम नहीं है जितना दिखता है। यह तो सबूतों को मिटा दिये जाने की प्रक्रिया में किया गया काम लगता है। वैसे अब खबरें यह भी हैं कि इसको चलाये रखने के लिये दसियों हजार रूपये लग रहे थे जो कि निश्चित ही किसी को भी निजी तौर पर मुफ्त सेवा देने वाले को भारी पड़ते होंगे।

बवाल said...

आदरणीय ज्ञान जी, आप हमें पाबला जी जैसे क्यों लग रहे हैं भला ? खै़र, जाने दीजिए। हा हा।

Fakeer said...

जब भी कभी किसी हिंदी ब्लॉग पोस्ट पर कमेन्ट करने जाता हूँ तो ऐसी जूतम-पैजार (पढें जूते चप्पलों की "shellling") देखकर झटका लगता है| सहम कर दूर से ही देखता हूँ कि कहीं मैं भी लाइन ऑफ़ फायर में ना आ जाऊँ!! खैर लगे रहो .. आगे यह देखने को लगा नहीं मिला तो बड़ा झटका लगेया .. इसकी आदत जो पड़ गयी अब :P

PS. वैसे ब्लॉग लिखना तो अभी तक शुरू नहीं किया है पर मैंने पहले ब्लोगवाणी साईट को परखने कि कोशिश कि थी ( तीसरे साल में मेरा माइनर प्रोजेक्ट था हिंदी वेब पोर्टल्स के अध्ययन का) | उनकी कोई ए.पी.आई तो नहीं मिली थी मुझे, पर हाँ मुझे इनकी साईट में गडबडी बिलकुल ही नहीं लगी थी.. और ऐसा कुछ नहीं था पक्षपात जैसा | सुरक्षा कारणों से ए.पी.आई या टेक्नीकल , सन्सोरिंग डिटेल्स पब्लिक नहीं करना उनकी मजबूरी है और खास कर के तब जब वो बड़ी संस्था नहीं है |

मसिजीवी said...

ये पूरा प्रकरण ही अत्‍यंत खेदजनक है। न केवल आरोप-प्रत्‍यारोप खेदजनक हैं वरन नीजर्क प्रतिक्रिया में ब्‍लॉगवाधी को बंद किया जाना भी। क्‍या कहें बेहद ठगा महसूस कर रहे हैं...अगर ब्‍लॉगवाणी केवल एक तकनीकी जुगाड़ भर था तो ठीक है जिसने उसे गढ़ा उसे हक है कि उसे मिटा दे पर अगर वह उससे कुछ अधिक था तो उस पर उन सभी शायद लाख से भी अधिक प्रविष्टियों की वजह से था जो इस निरंतर बहते प्रयास की बूंदें थीं तथा इतने सारे लोगों ने उसे रचा था.... हम इस एप्रोच पर अफसोस व्‍यक्त करते हैं। यदि कुछ लोगों की आपत्ति इतनी ढेर सी मौन संस्‍तुतियों से अधिक महत्‍व रखती है तो हम क्‍या कहें...।

मुनीश ( munish ) said...

Mr. Bavaal has a point Your Honour !

ज्ञान said...

@ बवाल जी
कुछ अनामियों ने अपरोक्ष यह जाहिर किया था इसलिये इस पर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। आप सनाम आयें हैं शक जाहिर करते तो मुझे डर लग रहा है कि मेरी रामलीला वाली फोटो तो नहीं देख ली आपने।
आदरणिया पाबला जी की तो पैर की धूल भी नहीं हो सकता मै,उनके जैसा क्या लगूंगा।
ये जरूअर है कि वे मेरे पडोसी शहर के हैं तो उन की खबर रहती है। किसी के लिये उनके जैसा होना किस्मत की बात होगी

रवीन्द्र रंजन said...

आदरणीय ज्ञान जी, जो होना था वो तो हो गया। मेरा खयाल है आप अपने उद्देश्य में सफल हो गए। बधाई स्वीकार करें।

Mithilesh dubey said...

बड़ा दुःख होता है तुम जैसे ब्लोगरो को देखकर जो की चन्द दिनो की ब्लोगिग मे पसन्द को लेकर इतना परेशान हो जाते है। अरे बकवास लिखो गे तो कोई तुम्हे पसन्द ना करेगा। अब तुम चाहते हो की तुम ही सारे पसन्द पर टिक लगा दो और तुम्हारा पोस्ट हीट जाये और ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े, । मुझे समज नहीं आता इस प्रकार के पोस्ट लिखने का क्या फायदा है। अरे तुम्हे ब्लोगवाणी से इतनी ही परेशानी है तो कोई तुम्ही नया एग्रिगेटर बना दो जो की ब्लोगवाणी को पिछे छोड़ सके, है माद्दा हो तो करो। दुसरो पर आरोप लगाना बड़ा सरल होता है कभी किसी ब्लोग का संचालन कर के देखो पता चलेगा की कितनी दिक्कते आती है।

हो सकता है कि कहीं कोई दिक्कत हो पसन्द को लेकर, तो ये बात तुम ब्लोगवाणी को मेल के माध्यम से भी बता सकते थे, सरेआम करने की क्या बात थी। जिस थाली में खाते हो कमसे कम यार उसे तो छोड़ दिया करो। अब लिखो पसन्द पर पोस्टे और पढ़वाओ सबको ।

रवीन्द्र रंजन said...

मिथिलेश दुबे से शत प्रतिशत सहमत

Apoorv said...

मैं भी सहम्त हूँ दुबे जी से..जिसे जाना था वे जा चुके..मगर दंगल अभी भी पूरी शिद्दत से जारी है..

Dipak 'Mashal' said...

अरे वाह, शाबाश ज्ञान जी, बहुत म्हणता का काम किया है आपने. ज़रा से चटका लगवाने के लिए मरे जा रहे लोगों के लिए तकनिकी खराबी को दोष न देकर व्यक्तिगत द्वेष करार दे डाला. भगवन न करे आप जज होते तो कितने निर्दोष मारे जाते. इससे दो फैदे हुए एक तो आपका ब्लॉग बहुत पोपुलर हो गया शायद इतने कमेन्ट तो जिंदगी में कभी न मिले होंगे, खुश हो लीजिये. और दूसरी बात चिठ्ठाजगत की आँखों के आप तारे बन गए. भाई साहब चटका न लगने से आपकी कला में कुछ कमी आ गयी क्या या उनकी में जिनके ब्लॉग पर चटका नहीं लगा. अगर आपका लिखा भी कोई चोरी करले तब भी कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि एक लेख चुरा लेगा हुनर थोड़े न. अगर सच में लेखनी में कमाल है तो एक दिन दुनिया के सामने आएगी ही, कोई नहीं रोक सकता और अगर रुक भी गया तो क्या? इतने बड़े कलाकारों को दुनिया भूल जाती है हम और आप हैं किस खेत की मूली. ब्लोग्वानी वालों के बंद कर लेने को आप शर्म के कारन की गयी खुदकुशी कह रहे हैं, अरे अगर आपमें ज़रा भी इंसानियत और शर्म है तो सोच के देखिये की निस्वार्थ कोई काम करने पर, लोगों का भला करने पर जब वो लोग ही जूता लेकर मारने को खड़े हो जाएँ जिनका भला कर रहे हों तो आपे क्या गुजरेगी शायद तब आप भी अपनी मौत को शर्म के कारण मरना ही बोलेंगे. है न? माफ़ करना इतना बुरा जीवन में किसी से नहीं बोला लेकिन आपकी इस नापाक और सिर्फ रेटिंग बढ़वाने के लिए की गयी गन्दी हरकत की वजह से बोलना पड़ा. कल को आपका कंप्यूटर चलते चलते बंद हो जाये तो जिस कंपनी का मशीन है उसके खिलाफ कोर्ट में जाके कहना की जी पर्सनल दुश्मनी निकाली है मेरे साथ. अब बड़े हो जाइये ये बचकानी हरकतें शोभा नहीं देतीं आपको.
अले ले ले ले कहके कब तक सब बहलाते रहेंगे आपको.

ज्ञान said...

@ आदरणिया मिथिलेश दुबे जी
आम तौर पर तू तड़ाक की भाषा में बात करने वाले को जवाब देना मैं पसंद नहीं करता। लेकिन जब आपका प्रोफाईल देखा तो पाया कि पडित समुदाय के छात्र होने के साथ साथ आपकी प्संदीदा पुस्तकें रामायण,गायत्री पुस्तक है,हिन्दि साहित्य मंच से जुड़ें है लेकिन दिये तले रह्ते हैं तो लगा कि दिया तले अंधेरा शायद इसे ही कहते हैं
चन्द दिनों की ब्लॉगिंग किसकी है आप देख लीजिये मई 2009 वाला चंद दिन का होता है या सितंबर 2008 वाला?
ब्लॉगवाणि को यह बात मेल द्वारा और सारवजनिक तौर पर दसियों बार बताई जा चुकी थी। आप खुद इतिहास छान लें।
मैं जिस थाली में खाता ही नहीं था तो उसमें छेद कहां करना था कैसे पता चलता
मेरी पोस्ट हिट हुई है तो आप जैसों के कारण हुई है वरना आप खुद देख सकते हैं कि ब्लॉगिंग के बड़े नाम यहाँ टिप्पणियों की सूची से गायब हैं।
अपनी जानकारी दुरूस्त कीजिये कि मेरे ब्लॉग़ पर ब्लॉगवाणी पसंद लगा ही नहीं था
अपनी तू तड़ाक की भाषा ऐसे ही रखियेगा आपका सामाजिक दायरा बहुत बड़ा होगा और आप अपने समुदाय व माता पिता का नाम सच में रौशन कर सकेंगे

ज्ञान said...

@ दीपक जी
जो काम दीपक नहीं कर सकता वो काम मशाल तो कर ही देगी
जज तो खुद ब्लॉगवाणी बन गया जिसने एक मामूली सी तकनीकी खामी की ओर इशारा करने पर हजारों ब्लॉगरों की चाहतों को मार डाला।
यह तो सारी दुनिया,बेमतलब बता रही है कि मेरी लेखनी में कितना कमाल है
जो लोग निस्वार्थ काम करते हैं वे अपनी गल्तियां मालूम होने पर सुधार करते हैं न कि आत्महत्या
रही बात रेटिंग बढ़वाने वाली तो मुझे बता दीजिये कि मेरे ब्लॉग ने कहां रेटिंग बढायी।गूगल पर,अलेक्सा पर,इंडीब्ळॉगर पर,टेक्नोरेटी पर
पता कर बताईयेगा
अले ले ले ले

Suresh Chiplunkar said...

आपने सभी के सवालों का जवाब देने की "कोशिश" (जी हाँ सिर्फ़ कोशिश) की है… लेकिन मेरी मुख्य आपत्ति यानी "खास विचारधारा" वाले शब्द पर कोई ठीकठाक तो क्या ढीलाढाला जवाब तक नहीं दिया? आपके द्वारा शुरु किये गये "संभावनाओं के खेल" में एक संभावना यह भी हो सकती है कि जिस तरह आपने खुशदीप के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाई, कोई दूसरा, आपको आगे करके "खास विचारधारा" पर निशाना साध रहा हो…।
सम्भावनाओं का खेल बड़ा निराला है भैया… अब ये मामला इतनी आसानी से निपटने वाला लगता नहीं… जय हो…
==========
विषयान्तर - आपने एक जगह कहा था कि मेरा प्रोफ़ाइल खुला हुआ है, क्या खुला है हुआ है इस प्रोफ़ाइल में? न तो फ़ोटो है, न ही मेल आईडी, न ही फ़ोन नम्बर? सिर्फ़ दुर्ग, छत्तीसगढ़ लिखने से प्रोफ़ाइल पूरा हो जाता है? नाम तक तो पूरा नहीं लिखा है "एम ज्ञान" से हम क्या समझें?

ज्ञान said...

@ चिपलूनकर जी
मैं नहीं जानता था कि "खास विचारधारा" का शब्द व्यक्तियों के लिये किसी तरह की छोटी बड़ी शंका का कारण बन सकता है।आपकी आपत्ति जिस शब्द को लेकर है वह शब्द तो मैंने कभी लिखा ही नहीं तो जवाब क्यों दूं।चाहे तो पोस्ट के आने वाले पल के बाद लिये गये किसी स्नैपशॉट देख लें।उसके बाद आप अपना सवाल बदल मत दीजियेगा।
किसी भी काम को करने के लिये कोशिश ही की जाती है,ताल ठोक कर किये जाने वाले काम में कोई फेल हो जाये तो जगहंसाई होती है।सभी बड़े काम,अविष्कार,खोजें कोशिश करने के बाद ही हुयी थी जहां किसी को क्या नतीजा मिलेगा नहीं मालूम था।जिसे आप संभावनायों का निराला खेल बता रहे हैं वह खेल तो पसंद पसम्द के रूप में ब्लॉगवाणी ने शुरू किया था जो खुद ही निपट गया।
यदि आप मान सकते हैं तो यह बता दुं कि न तो मैं अपना कंधा किसी को इस्तेमाल करने देता हूं न ही मेरे हाथ में कोई बंदूक है।मैंने तो तालाब में एक कंकड़ फेंका था जो पहले से रखे संवेदन्शिल बम जैसी बातों के ट्रिगर पर जा पड़ा और कसूरवार बन गया।
=======
विषयागत - आप कहते हैं कि मेरे प्रोफाईल में न तो फ़ोटो है, न ही मेल आईडी, न ही फ़ोन नम्बर? सिर्फ़ दुर्ग, छत्तीसगढ़ लिखने से प्रोफ़ाइल पूरा हो जाता है? नाम तक तो पूरा नहीं लिखा है "एम ज्ञान" से हम क्या समझें?
तो आप अपना प्रोफाईल देख लीजिये
न ही मेल आईडी,न ही व्यवसाय,न ही फ़ोन नम्बर?Ujjain(MP)लिखने से प्रोफ़ाइल पूरा हो जाता है? नाम लिखा है "सुरेश चिपलूनकर" सुरेश या चिपलूनकर से हम क्या समझें? फोटो जरूर लगी है लेकिन आप ही की है कौन जानता है क्योंकि इंटरनेट पर तो लोग अपने चहेते फूल,पतों,दोपाये,कार्टुन की फोटो भी लगा देते हैं
बंधु,एक को छोड़ बाकी उंगलियां खुद आप अपनी तरफ रखें हैं।
कृपया शांति बनाये रखें

Etips-Blog said...

AAPKO APNE BLOG KO BAND KAR DENA CHAHIYE..BLOGVANI SE ITNI HI JALAN THI TO AAP NAYA AGRINETOR KHADA KAR SAKTE THE..BAHI KUCHH BHI HO AAP TO BADE CHHUPA RUSTAM NIKLE.BLOGVANI GAYI TO KYA HUVA AAPKO 80 COMMENTS TO MILGAYE..READ MORE>>

ज्ञान said...

@ Etips-Blog
मुझे ब्लॉगवाणी से कोई जलन नहीं थी।अपकी बाकी बातों का जवाब तब देता जब आप्का प्रोफाईल मिलता

ज्ञान said...

सभी को बधाई
ब्लॉगवाणी वापस

Suresh Chiplunkar said...

मेरा मेल आईडी मेरे ब्लाग पर साफ़-साफ़ अक्षरों में लिखा है… कृपया ध्यान से देखें…

["यही नहीं, कुछ खासा विचारधारा की ब्लॉग पोस्टों की पसंद अप्रत्याशित रूप से बढ़ती रहती है…"] यह लाइन आपकी पोस्ट से ही उठाई है… और अभी भी मौजूद है… अब ये न कहियेगा कि यह मैंने नहीं लिखा था…। आप बेनामियों और बगैर प्रोफ़ाइल वालों को जवाब नहीं देते हैं फ़िर भी आपने मेरी बातों का जवाब दिया, यानी इसमें कोई न कोई तथ्य अवश्य हैं…

अब जो बात बेनामी पूछ रहे हैं मैं भी पूछ लेता हूं कि दूसरों की लाइन को खराब या छोटी बनाने या मिटाने के बजाय, खुद आपने बड़ी लाइन क्यों नहीं खींच ली? याने कि एक नया एग्रीगेटर बनाईये, हिन्दी और आपका दोनों का भला होगा…

Suresh Chiplunkar said...

1) फ़ोटो मेरा ही है, इसका सबूत विभिन्न ब्लागर मीट के फ़ोटो से आपको भिजवा सकता हूं… आप भी अपना फ़ोटो भिजवाईये सबूत के साथ…

2) मेरे नाम से आपको पता नहीं चला कि मैं मराठी और कोंकणस्थ ब्राह्मण हूं… तो मुझे आश्चर्य है… "एम ज्ञान" से तो ऐसा कुछ खुलासा नहीं होता…

3) शान्ति बनाये हुए हूं अभी तक… :) इसीलिये इतनी टिप्पणियों के बावजूद इस पर एक भी पोस्ट नहीं लिखी, जबकि इतनी टिप्पणियों को संकलित करके ही एक पोस्ट बन जाती… :)

4) फ़िलहाल तो मैं आपके फ़ोटो और मेल आईडी का इंतज़ार कर रहा हूं, ताकि आपसे व्यक्तिगत सम्पर्क करूं और पूछूं कि "खास विचारधारा" से आपको इतनी एलर्जी क्यों है? और यदि आप कहें तो आपकी खुशी के लिये मैं अपने ब्लाग से "पसन्द" वाला कोड ही हटा दूं?

पंकज बेंगाणी said...

हम कैसे छोटे बच्चों की तरह लड़ते हैं. क्या यही बचा है अब!

एक ब्लॉगवाणी है, जो कथित तौर पर कुछ "अजीब मानसिकता" वालें लोगों के द्वारा उकसाए जाने पर बंद कर दी जाती है. फिर दो दिन बाद चालू हो जाती है!

मान-मनौवल होता है. आ जाओ आ जाओ आ जाओ होता है. कोई बहिष्कार कर रहा है, कोई एक सप्ताह तक ना लिखने की बात करता है.


क्या है यह सब?

इसलिए ही हम लोग इतना पीछे हैं. क्या सार्थक करने को कुछ नहीं है.

ज्ञान said...

@ चिपलूनकर जी
आपने प्रोफाईल की बात की थी, मैंने प्रोफाईल की बात की।
["यही नहीं, कुछ खासा विचारधारा की ब्लॉग पोस्टों की पसंद अप्रत्याशित रूप से बढ़ती रहती है…"] मैंने लिखी थी लेकिन आपके द्वारा आपत्तिजनक शब्द "खास विचारधारा" का उपयोग मैंने कहीं नहीं किया ध्यान से देख लीजिये।
आप ना तो बेनामी हैं,ना बिना प्रोफाईल वाले।यहां कई ऐसे हैं जिनका कोई प्रोफाईल उपलब्ध नहीं। आपके प्रोफाईल में कुछ तो है।
आपकी बातों का जवाब देने का मुख्य कारण है कि आप सभ्यता के दायरे में बात करते हैं।
अपने व्यवसाय से जब फुरसत होगी तो हिंदी के भले के लिये अवश्य कुछ करूँगा।
नाम में क्या रखा है शेक्सपियर कह गये हैं।
आप अपने ब्लॉग में क्या लिखते हैं,क्या रखते हैं,क्या हटाते हैं यह आपका अधिकार है चाहे कोई खुश हों ना हों
व्यवसाय के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा हूँ इसलिये मोडेरेशन भी चालू कर रहा। एकाध हफ्ते में वापस आना होगा। आपके साथ स्वस्थ बातें कर अचछा लगा।ध्नयवाद

Mithilesh dubey said...

ज्ञान जी अगर मेरा आपको तुम कहना बुरा लगा है तो मैंने जहाँ-जहाँ तुम का प्रयोग किया है मैं आप लगा देता हूँ, अगर मैंने क्रोध वश कुछ गलत कह दिया हो तो मैं उसके लिए भी क्षमा चाहता हूँ। मैंने आपको कुछ दिनो का ब्लोगर कहा था लेकिन मैंने ये कहीं नहीं कहा था कि मैं पुराना ब्लोगर हूँ , मेरा कहना उन लोगो के लिए था जो आपसे बहुत दिनो पहले से ब्लोगिग कर रहे हैं। लेकिन वे लोग कभी भी इस तरह की तुच्ची बाते नहीं कीं। आप पसन्द को लेकर लिक रहे है तो कोई ये कह रहा है कि मुझे टिप्पणी नहीं मिल राह है तो इसका जिम्मेदार ब्लोगवाणी है क्या। आप कह रहे है कि आपने ब्लोग वाणी को बहुत से मेल भेजे लेकिन जवाब नहीं आया, नहीं आया तो क्या हुआ, आप का गुलाम है क्या ब्लोगवाणी दे या नां दे ये उसके ऊपर निर्भर करता है। आप कह रहे हैं बडे़ ब्लोगरो ने टिप्पणी नहीं दी, ब्लोगवाणी के नाम पर इसपर भी एक पोस्ट बना दिजीये और कह दिजीये कि ब्लोगवाणी पक्ष पात कर रहा है। आप कह रहे है कि आप जिस थाली मे खाते ही नहीं थे तो उसमे छेद क्या करेगें तो भाई अगर ऐसा है तो आपने ब्लोगवानी पर पोस्ट क्यों करते है। हाँ आपके कहना बिल्कुल सही है कि दिये तले अंधेरा रहता है , लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि जब दिया रहेगा तभी अंधेरा भी होगा ना।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

समय मिले तो पढियेगा http://raksingh.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html

Bipin -- Corporate Communcations said...

Dear Sir
We see many links of our company profile here without our consent.
The given links have been posted on various websites with our consent .
Reviewing who viwed our profile we
have found that one server from
Steel Authority Of India responsible
for going on all these sites with span of few minutes.
Our investigations lead to zero three bloggers working in SAIL .
We have contacted SAIL / SAIL Bhilai for furthur clarifications .
sailbsp@sancharnet.in
sailco@vsnl.com
Our company is not a hindi blogger so why was there a need to accumlate and circulate this information .

This is the information we have have from our profile on linkedin
Your profile has been viewed by 5 people in the last 7 days, including:
Someone in the Clerical function in the Graphic Design industry from Orlando, Florida Area
Someone in the Marketing function in the Automotive industry from India
Someone in the Leadership function in the Textiles industry from Singapore
Field Director at Republican Party of Minnesota
Someone at Steel Authority of India Limited

The server was Nib (national Internet Backbone) (117.198.39.28}

निर्मला कपिला said...

ब्लागवाणी का बन्द होना दुखद और शर्मनाक है क्या हम झूठे चटकों के लिये ही लिखते हैं ? स्वार्थसाधना के लिये सब को परेशानी मे दाल दिया गया है। चिट्ठा जगत आसान नही लगता और कहीं गये नही
हमजैसे तकनीक से अनजान लोग क्या करें क्या इस पर भी कोई सुझाव आयेगा?
ब्लागवाणी से प्रर्थना है कि इन बातों पर न जा कर अपना काम करें फिर जब कोई काम करेगा तभी आलोचना होगी } यहीं से पता चलता है कि कुछ काम हो रहा है।